Aaroh

This one was penned on the morning of 9th September, the day my little one, Aaroh, was born. The delay? Well…

कहीं अपनी नज़र ना लग जाए,
अपनी आवाज भी पर्दों में छुपा दी मैंने।

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तुमने आने की खबर यूँ दी है…
जैसे शाम के धुंधलके में
कमरे के कोने में खड़ा वो गिटार
हवा के झोंके से हिलते पर्दों से टकरा कर
एक नयी सरगम बना गया हो।

एक तूफ़ान था बिखरा सा झरोखे के परे
एक ख़ामोशी थी सहमी हुई सिरहाने में
ये नाखून ख़त्म हो से गए थे
पसीने से लथपथ एक साया
और तीन जोड़ी आँखें इंतज़ार में
और न जाने कितने कान जो फ़ोन की घंटी
में तुम्हारा ज़िक्र ढूंढते थे

और जब पर्दा खुला
नेपथ्य से इक आवाज़ आयी
बाअदब बमुलायाज़ा होशियार
शहंशाह ए हुकूमत
ताजीरात ए दास परिवार
सिंघासन पर ‘आरोह’ कर रहे हैं।

साज़ के सुर की तरह
सुबह के नूर की तरह
शाम की अज़ान के मानिन्द
इक नए दस्तूर की तरह

हवा का इल्म हो तुम
होठों की आवाज़ हो तुम
इक हसीं ख्वाब हो तुम
एक नया आगाज़ हो तुम

इक दरख़्त का साया
इक आम की गुठली हो तुम
मेरे लड़खड़ाते कदमो को थाम ले
वो ऊँगली हो तुम

तुम मेरा कल हो
तुम्हारा आज हूँ मैं
तुम्हारी अनकही कहानी का
अंदाज़ हूँ मैं

मेरी जन्नत मेरा इल्हाम हो तुम
मेरे चेहरे में मेरी रूह का पैगाम हो तुम
तुम ही आरोह हो अवरोह तुम ही हो मेरा
तुम ही मेरा राग हो, संगीत हो, मेरी ताल हो तुम

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