Mahabharat Ki Ik Shaam

Ruko nahi
Ab mat ruk jaana
Aaj jo jaage ho
To talwaron se dar kar
Mat jhuk jaana

Roz maraa karte the tum
Ab jab jeene ki sochi hai
Ji kar dikhlao
Paani ke dar se
Ya aanson ke behne se
Na ab ghabrao

Krodh ko paalo
Aag dhadhakne do seene me
Na ki pashu ki bhaanti
bauraye se daudo idhar udhar
Is krantipoorn mahine mein

Jhuka hai pehle bhi
Tanashahon ka taj
Jhukega kal phir bhi

Bhale qilon mein baithe hain
deekh padi hai unki thar thar
Aur maathe par bal phir bhi

Aaj agar tum palat gaye
Ghar laut gaye
Phir kaun sa amrit manthan hoga
Kyun hoga
Phir mrit janjeevan ka
Chakra chalega
Jyon jyon hota aaya hai
Tyon tyon hi hoga

 

रुको नहीं

अब मत रुक जाना .

आज जो जागे हो

तो तलवारों से डर कर

मत झुक जाना .

 

रोज़ मरा करते थे तुम

अब जब जीने की सोची है

जी कर दिखलाओ।

 

पानी के डर से

या आँसू के बहने से

ना अब घबराओ।

क्रोध को पालो,

आग धधकने दो सीने में।

 

न की पशु की भाँती

बौराए से दौड़ो इधर उधर

इस क्रान्तिपूर्ण महीने में।
झुका है पहले भी

तानाशाहों का ताज़,

झुकेगा कल फिर भी।

 

भले किलों में बैठे हैं,

दीख पड़ी है उनकी थर थर

और माथे पर बल फिर भी।

 

आज अगर तुम पलट गए

घर लौट गए,

फिर कौन सा अमृत मंथन होगा ?

क्यूँ होगा?

फिर मृत जनजीवन का

चक्र चलेगा।

ज्यों ज्यों होता आया है ,

त्यों त्यों ही होगा।

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aisa hota, waisa hota (ऐसा होता, वैसा होता)

उसका सर काँधे पे होता
ऐ खुदा कुछ ऐसा होता
हम भी थोडा मुस्कुराते
गर कभी कुछ वैसा होता

सोचता क्या ख्वाब होंगे
उन हसीन पर्दों के पीछे
मेरे रातों का भी साया
उनके ख़्वाबों जैसा होता

हाय वो चेहरे पे हल्की सी हँसी हल्का सा ग़म
इन बदलते मौसमों में एक मौसम वैसा होता

आज की तहरीर होती, कल की दो-इक ख्वाहिशें
मेरे दिल का हाल सुन कर उनका दिल भी ऐसा होता
कुछ भटकता, कुछ बहलता, और थोडा खुशनुमा
ऐसा होता, वैसा होता, जाने कैसा कैसा होता….

 

डर और उम्मीद (Fear and Hope)

आज की रात
हवाओं के परों पर
गिरती दिख रही है
कोई परछाई…
मुझे अँधेरे से डर नहीं लगता है.
मगर ये जानता हूँ
अंधेरों की परछाइयों को
कितना वक्त लगता है…

ढलने में, पिघलने में.

नहीं कोई घर बना है
मेरे डर का.
न कोई उम्र बाबस्ता हुई है
मेरे डर की.

मैं ये भी जानता हूँ कि
सुबह की रौशनी
अब उस किनारे है
जहां कुछ लोग
आवाजें दिया करते हैं उस को
जिसके ये सारे इशारे हैं.

मैं उन आवाजों में
ढूँढा किया करता हूँ
कुछ गजलें.

जिन्हें तुमको सूना कर
कुछ नए से
रंग भर दूं.
अपने डर में
अपने डर को
काबू कर लूं.

कोई कहता है की हंस दो
डर पे या मुश्किल पे …
वो डर जाते हैं.
उन्हें लगता है की
ये कैसा दीवाना है…
कितना सयाना है…

जो मुरझाए हुए फूलों को
दे के
उस सनम से कहता फिरता है.
की ये ले –

इनमे न ओस की बूँद
न खुशबू का शुमार है.
मगर ये सच की इक डाली है,
इक पुरकैफ बहार है.

की जिसको थाम कर
तुम से समझ जाओगी की
नहीं होते हैं पाँव
डर-ओ-मुश्किल के
नहीं होते
नुकीले हाथ उनके.
उनका तो बस होता है
धुंधला सा चेहरा.
वो चेहरा
जिसको उस रब ने बनाया है.
और चेहरों से क़त्ल नहीं होते,
तुझे किसी ने उल्लू बनाया है.

यही कह कर वो छोटी से परी
आँखों से ओझल हो गयी है.
वो बादल की परछाई
आँखों से उतर कर
झील के पहलू में
सूरज का नया इक अक्स ले कर
इस सुबह फिर
ढल सी गयी है.
जिंदगी फिर से
सहल सी हो गयी है.

Kinaare (किनारे)

एक ख्वाब हो तुम ….
और मेरा डर
कि अधूरा न रह जाऊं
वक़्त के साए में…

ठहरी हुई
ये कागज़ कि नाव
किनारे से लग कर
लहरों से लड़ कर,
थक कर
फिर तुम्हारी साँसों से
ज़िन्दगी जीने का सबब पूछेगी…

और फिर
तुम मेरा हाथ थाम लेना …
मेरे डर को किनारों की जरूरत है…
इस कागज़ की नाव को
बह जाने दो..
कुछ किनारे समंदर के बीच होते हैं….

झील में डूबा चाँद

गई रात हमने चाँद को
झील में डुबो के रखा…
नर्म हो गया,
सिला सिला भी…
जैसे चाय की प्याली में
अरारोट बिस्किट का टुकड़ा
डूब गया हो…

चाँद निगल कर रात गुजारी,
जिगर के छाले और पक गए…
दर्द दबाया,
सूखे कपड़ो से किनारियाँ दबा कर
फुलकों की तरह फूले अरमानों का
तकिया बनाया…

रात बहोत महीन थी…
रात के मांझे से कट कर
चाँद झील में डूब गया था…

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