Dilli, बड़ी रफ़्तार है

बड़ी रफ़्तार है तेरे शहर में

हर इक ठहराव पे गुस्सा निकलता है
बड़ी रफ़्तार से
हर इक तकरार पे चलते हैं खंजर
बड़ी रफ़्तार से

कभी गर भीड़ में रफ़्तार धीमी पड़ गयी तो
कोई चिल्लाता है फ़ौरन से,भइ
साइड को हो ले दिखाई को ना देता
पलट के आती है गाली बड़ी रफ़्तार से

कभी पीले से कपडों से दुप्पट्टा जैसे सरका
तभी झोंके से आई एक सीटी
बड़ी रफ़्तार से
चिपक के एक फब्ती कस दी किसने
मिली बेशर्म आँखें फिर
बड़ी रफ़्तार से

दिलाया याद सबको कौन हैं वो,नाम क्या है
दिया ठुल्ले को सौ का नोट
क्या रफ़्तार से
जो बच कर आँखों से छुपना हो मुमकिन
तो मारी केडी क्या रफ़्तार से

अगर भूले से आँखें मिल गयी तो
किया इनकार क्या रफ्तार से
जो उसने ज़ोर डाला सच का जालिम
दुहाई दी तो क्या रफ़्तार से

जो देखा सामने कमज़ोर कोई
दबाया उसको किस रफ़्तार से
जो देखा सामने भारी सा कोई
दबाया सच को भी रफ़्तार से

ये रफ़्तार तेरी है न मेरी
ये न सच है न कोई झूठ ही है
ये है रफ़्तार अब इस ज़िन्दगी की
ये है रफ़्तार तेरे इस शहर की

बड़ी रफ़्तार है तेरे शहर में
बहोत डर लगता ही तेरे शहर से

आज और कल के बीच कहीं Happy New Year

तुम कहते हो की गुज़र गया
पर मैंने थोड़ा बाँध लिया
एक पोटली में
गुड़ और रोटी के बीच कहीं
मैंने कुछ सपने बोये थे
इक ऐसी ही तारीख गयी थी
तब भी गुज़रा था ऐसा ही कुछ
तब भी कुछ और समेटा था
अब देखूंगा कल सुब्हा फिर
क्या कोई  फूल खिला है वहां
आज नहीं तो कल होगा

या आज और कल के बीच कहीं

हर साल मुबारक हो तुमको
इस साल और उस के बीच  कहीं |

नव वर्ष की शुभकामनाएं.

My warm wishes for a very happy new year and a and prosperous 2015

An unfinished poem

As I wait
For it to be clear,
It gets a little murkier still
The directions, the roads,
And the destinations,
Seem a little farther still.

The wanderlust, the open eyes
The craving in the middle of the night
The blanket hot and cold the same
The reading by the candlelight

The solitary temple by the fields
The fireflies, the mellow dark,
The lonely walk to nowhere
The differences in colors so stark

A fish in the pond,
And a frog in the well,
Once taken across the timeless wheel.
A burning itch, and a soulless ditch,
No backward glance, a game of chance.

On these and much more, now I dwell.

aisa hota, waisa hota (ऐसा होता, वैसा होता)

उसका सर काँधे पे होता
ऐ खुदा कुछ ऐसा होता
हम भी थोडा मुस्कुराते
गर कभी कुछ वैसा होता

सोचता क्या ख्वाब होंगे
उन हसीन पर्दों के पीछे
मेरे रातों का भी साया
उनके ख़्वाबों जैसा होता

हाय वो चेहरे पे हल्की सी हँसी हल्का सा ग़म
इन बदलते मौसमों में एक मौसम वैसा होता

आज की तहरीर होती, कल की दो-इक ख्वाहिशें
मेरे दिल का हाल सुन कर उनका दिल भी ऐसा होता
कुछ भटकता, कुछ बहलता, और थोडा खुशनुमा
ऐसा होता, वैसा होता, जाने कैसा कैसा होता….

 

डर और उम्मीद (Fear and Hope)

आज की रात
हवाओं के परों पर
गिरती दिख रही है
कोई परछाई…
मुझे अँधेरे से डर नहीं लगता है.
मगर ये जानता हूँ
अंधेरों की परछाइयों को
कितना वक्त लगता है…

ढलने में, पिघलने में.

नहीं कोई घर बना है
मेरे डर का.
न कोई उम्र बाबस्ता हुई है
मेरे डर की.

मैं ये भी जानता हूँ कि
सुबह की रौशनी
अब उस किनारे है
जहां कुछ लोग
आवाजें दिया करते हैं उस को
जिसके ये सारे इशारे हैं.

मैं उन आवाजों में
ढूँढा किया करता हूँ
कुछ गजलें.

जिन्हें तुमको सूना कर
कुछ नए से
रंग भर दूं.
अपने डर में
अपने डर को
काबू कर लूं.

कोई कहता है की हंस दो
डर पे या मुश्किल पे …
वो डर जाते हैं.
उन्हें लगता है की
ये कैसा दीवाना है…
कितना सयाना है…

जो मुरझाए हुए फूलों को
दे के
उस सनम से कहता फिरता है.
की ये ले –

इनमे न ओस की बूँद
न खुशबू का शुमार है.
मगर ये सच की इक डाली है,
इक पुरकैफ बहार है.

की जिसको थाम कर
तुम से समझ जाओगी की
नहीं होते हैं पाँव
डर-ओ-मुश्किल के
नहीं होते
नुकीले हाथ उनके.
उनका तो बस होता है
धुंधला सा चेहरा.
वो चेहरा
जिसको उस रब ने बनाया है.
और चेहरों से क़त्ल नहीं होते,
तुझे किसी ने उल्लू बनाया है.

यही कह कर वो छोटी से परी
आँखों से ओझल हो गयी है.
वो बादल की परछाई
आँखों से उतर कर
झील के पहलू में
सूरज का नया इक अक्स ले कर
इस सुबह फिर
ढल सी गयी है.
जिंदगी फिर से
सहल सी हो गयी है.

Aapki Yaad Aati Rahi (Makhdoom/ Chaya Ganguly)

Here is a ghazal by Makhdoom Mohiuddin and beautifully rendered by Chaya Ganguly.

What follows is my feeble attempt at a literal translation (hoping that I don’t add my interpretation to it)

Aap ki yaad aatee rahee raat bhar
Chashm-e-nam muskaratee rahee raat bhar

The night was haunted by your memories
And my teary eyes smiled all night long

Raat bhar dard ki shamma jaltee rahee
Gham ki lau thartharatee rahee raat bhar

The candles of pain kept the night awake
And the flames of sadness kept flickering all night long

Bansuri ki surilee suhanee sada
Yaad ban ban kay aatee rahi raat bhar

Ah, the sweet soulful yearning of the flute
Kept tugging at my memories all night long

Yaad kay chaand dil mein utartay rahay
Chandni jagmagatee rahi raat bhar

As the moons of a memory would set in my heart
The moonlight kept shining like a beacon all night long

Koee deevana galiyon mein phirta raha
Koee aawaz aati rahi raat bhar

A forelorn lover kept wandering the streets
And a voice could well be heard all night long

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When Makdhoom died, Faiz wrote the following lines in his memory (“Makhdoom ki yaad mein”–Faiz Ahmed Faiz)

“Aap ki yaad aati rahi raat bhar”
chaandni dil dukhaati rahi raat bhar

The night was haunted by your memories
And the moonlights made my heart bleed all night long

gaah jalti hui, gaah bujhti hui
shamm-e-gham jhilmilaati rahi raat bhar

Restlessly, it flickered at times, at times it didn’t
The flame of sadness kept shining all night long

koi khushboo badalti rahi pairahan
koi tasveer gaati rahi raat bhar

A fragrance kept changing its body all night
And a portrait kept singing all night long

phir sabaa saaya-e-shaakh-e-gul ke talay
koi qissa sunaati rahi raat bhar

And again, in the shades of blossomed tree
A gentle breeze narrated some tales  all night long

jo na aaya use koi zanjeer-e-dar
har sadaa par bulaati rahi raat bhar

The chains of the courtyard, with every call,
Sought him, who did not turn up, all night long

eik ummeed se dil behalta raha
ik tamanna sataati rahi raat bhar

A hope kept my heart at bay
And a desire kept burning within all night long

(Faiz–Sept 1978, Moscow)

Kinaare (किनारे)

एक ख्वाब हो तुम ….
और मेरा डर
कि अधूरा न रह जाऊं
वक़्त के साए में…

ठहरी हुई
ये कागज़ कि नाव
किनारे से लग कर
लहरों से लड़ कर,
थक कर
फिर तुम्हारी साँसों से
ज़िन्दगी जीने का सबब पूछेगी…

और फिर
तुम मेरा हाथ थाम लेना …
मेरे डर को किनारों की जरूरत है…
इस कागज़ की नाव को
बह जाने दो..
कुछ किनारे समंदर के बीच होते हैं….

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